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विकास दुबे का जब यूपी पुलिस एनकाउंटर कर सकती हैं तो फिर किसानों के हत्यारे का क्यों नहीं: प्रमोद

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने किसानों को कहा था देश की आत्मा 

ऑफ द पिपल, फार द पिपल और बाई द पिपल हैं लोकतंत्र का मानक 

रेलवे भारत के गरीब जनता की हैं सबसे बड़ी संपति 

औरंगाबाद। किसानों की समस्या, निजीकरण, बढ़ती महंगाई एवं रोजगार को लेकर रफीगंज विधान सभा के पूर्व प्रत्याशी व प्रमुख समाजसेवी प्रमोद कुमार सिंह ने कहा है कि फ़र्क साफ़ हैं। कानून की नज़रों में सभी सामान्य हैं तो, फिर भेद कैसा? जब अपराधी विकास दुबे का उत्तर प्रदेश की पुलिस एनकाउंटर कर सकती है तो फिर सत्ता के अहंकार में चूर उस हत्यारे को क्यों नहीं जिसने सात आंदोलित किसान एवं एक पत्रकार की हत्या कर दी। श्री सिंह ने कहा कि बीते रविवार को जिस प्रकार से सत्ता के अहंकार में चुर उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा के बेटा आशीष मिश्रा की कार ने प्रदर्शन कर रहे चार किसानों को रौंद कर मार डाला। वहीं, इसके बाद भड़की हिंसा में चार अन्य लोग और मारे गए। इस मामले में राजनीति की कोई गुंजाइश नहीं है। सरकार दोषी को सजा दे। लेकिन कार्यवाई के बजाय सरकार केवल ब्यानबाजी कर रही है, जो कहीं से तर्कसंगत नहीं है। कानून सभी के लिए समान्य है जिसमें सबका अधिकार है कि उन्हें न्याय मिलें। आज जिस प्रकार से किसानों को खालिस्तानी, परजीवी एवं आतंकवादी जैसे सूचक शब्दों से संबोधित किया जा रहा है। वह कहीं से उचित नहीं है। जबकि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने किसानों को देश का आत्मा कहा था। कहा कि केन्द्र की निर्वतमान सरकार इस बात को लेकर बहुत सन्तुष्ट नज़र आ रही है कि कृषि क़ानूनों का अभी मुख्य रूप से सिर्फ़ दो राज्यों-पंजाब और हरियाणा में ही विरोध हो रहा है। बाक़ी देश के किसान ख़ुश और गदगद हैं, मानो मोदी जी ने एक और चमत्कार कर दिखाया है। जबकि हकिकत तो यह है कि कुछ सामर्थ्यवान लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार किसानों पर पिछले लगभग ग्यारह महिनों से लगातार जूल्म ढ़ा रही है। अब तक आंदोलित सैंकड़ों किसानों की मौत चुकी है। लेकिन उनकी न कोई सुनने वाला है और न कोई देखने वाला है। कहा कि लोकतंत्र के संदर्भ में अब्राहिम लिंकन की माने तो ऑफ द पिपल, फार द पिपल और बाई द पिपल’’ को लोकतंत्र के लिए मानक माना गया है। अर्थात एक लोकतांत्रिक देश में राजनीति उतनी ही महत्व रखती है जितनी कि दांतों के बीच जीभ। जैसे कि दांतों के बीच में रह कर जीभ को बड़ी सावधानी से अपने सारे काम करने पड़ते हैं। वैसे ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में रखकर राजनीतिक दलों को राजनीति भी करना पड़ता है। लेकिन केन्द्र सरकार खुद को अलोकतांत्रिक होने की प्रमाण बाट रही है। इधर सुविधा के लिए आम जनता की गाढ़ी कमाई से तैयार की गई सार्वजनिक संपत्तियां आज निजीकरण के खेल में भारत सरकार के पास से एयर इंडिया निकल कर टाटा समूह के पास एक बार फिर चली गयी। देखा जाए तो केन्द्र सरकार का यह कदम आत्मनिर्भर नहीं बल्कि आत्मघाती कदम है। देश की आर्थिक स्थिति किसी से छिपी नहीं है। ये विकास के लाख दावे और वादे करते रहे, लेकीन हकिकत सबको पता है। बावजूद कोई सामने आने को तैयार नहीं है। यह भी पता है कि सरकार द्वारा जारी अंधाधुंध निजीकरण का भविष्य में क्या दूरगामी परिणाम सामने आने वाले हैं। इसी सिलसिले में कर्ज से जूझ रही एयर इंडिया को सरकार की बेचने का कोशिश आखिरकार कामयाब हो गई जिसे पूर्व प्रधानमंत्री इंदरा गांधी ने 70 साल के आस-पास खरिदी थी जो उसे निर्वतमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नीलाम कर दी। पिछले कई साल से टलते-टलते आखिरकार एयर इंडिया के लिए दो बोली लगी। एक टाटा संस ने लगाई तो दूसरी बोली स्पाइसजेट के चेयरमैन अजय सिंह ने लगाई। हालांकि बोली टाटा ग्रुप की कंपनी टाटा संस ने जीत ली है और एकबार फिर एयर इंडिया टाटा ग्रुप के पास लौट आई है। विकास के दावे और वादे की हकिकत: आखिर क्या कारण है कि पिछले सात सालों से देश की तमाम कमाऊं पूत (सरकारी उपक्रम) एक के बाद एक समय के साथ बिकते चले गय
े। माना की सरकार ने धारा 370, 35 ए और राम मंदिर जैसे विवादित मुद्दों पर सरकार ने अच्छी पहल की है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं की इन मुद्दो पर जनता को अमली जामा पहनाया जाय और सार्वजनिक उपक्रमों की परिसंपत्तियों को औने-पौने दामों में निजी व्यापारियों को बेचना ही विकास का पर्याय मान लिया जाए। यह कार्य देशभक्ति का नहीं है बल्कि देश के साथ धोखा है। ऐसा लगता है की सरकार रणनीतिक क्षेत्रों में कुछ सार्वजनिक उपक्रमों को छोड़कर बाकी क्षेत्रों में सरकारी उपक्रमों का निजीकरण हेतु प्रतिबद्ध है। कोरोना महामारी के दौरान केंद्र सरकार ने जिस आत्मनिर्भर भारत की घोषणा की थी उसके पीछे की सच अब धीरे-धीरे सामने आ रही है, जहां सरकार देश की तमाम मजबूत सरकारी उपक्रम एवं संस्थाओं को एक-एक कर बेचने के लिए प्रतिबद्ध है। देश में अर्थव्यवस्था को तबाह करने के साथ-साथ बेरोजगारी को बढ़ाने वाला है। एक तो देश में वैसे भी समस्याओं की कोई जमी नहीं हैं। बढ़ती महंगाई और रोजगार की मार झेल रही जनता सरकार से दया का भीख मांग रही हैं और सरकार हैं कि अपनी मनमानी पर अमादा है। दूरगामी परिणाम : दुनियां भर में जिन युवाओं के बलबूते हम खुद को युवा शक्ति का दंभ भरते हैं। आज वहीं युवा शक्ति एक अदद नौकरी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि प्रतिदिन बढ़ती बेरोजगारी के कारण सबसे अधिक आत्म हत्याओं का कलंक भी हमारे देश के माथे पर ही लगा हुआ है जिनके दम पर हम भविष्य में मजबूत इमारत खड़े करने का आस लगाए बैठे हैं उसकी नींव की हालत निराशाजनक है और हमारी नीतियों के खोखलेपन को राष्ट्रीय पटल पर प्रदर्शित कर रही है। आंकड़ों के मुताबिक आज भारत दुनिया के सबसे ज्यादा बेरोजगारों का देश बन गया है। बेरोजगारी की समस्या वर्ष दर वर्ष और गंभीर होती जा रही है तो क्या मान लिया जाए की भारत में बढ़ती बेरोजगारी खुदकुशियों के एक नए कीर्तिमान की ओर अग्रसर हो रहा है?देश में बेरोजगारी के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पढ़े-लिखे लोगों मे बेरोजगारी का आलम यह है कि चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी के पद के लिए प्रबंधन की पढ़ाई करने वाले और वोकेशनल व प्रोफेशनल डिग्रीधारी भी आवेदन करते हैं। ऐसे में बमुश्किल किसी निजी संस्थान में अस्थायी नौकरी मिलना भविष्य में नौकरी की सुरक्षा के लिए लिहाज से एक बड़ा खतरा है। देश में बेरोजगारी की दर कम किए बिना विकास का दावा करना कभी भी न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। देश का शिक्षित बेरोजगार युवा आज स्थायी रोजगार की तलाश में है। कहा कि महान समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि रेलवे भारत की गरीब जनता की सबसे बड़ी संपति है जिसकी सुरक्षा करना सरकार का प्रथम दायित्व है क्योंकि भारत में रेलवे नेटवर्क बिछाने में सबसे बड़ा योगदान गरीब किसानों का रहा है जिन्होंने अपनी जमीनें इसके लिए दी हैं। अतः गरीब आदमी का रेल सफर करने का सबसे पहला अधिकार बनता है और सरकार को उसकी जेब को देखते हुए ही किराये का निर्धारण भी करना चाहिए।

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