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बिना सूचना के प्रतिमा स्थापित किए जाने पर जन विकास परिषद एंव जनेश्वर विकास केन्द्र ने किया विरोध

औरंगाबाद। आज निष्ठा, समर्पण तथा निरंतर कर्मठता को ठिकाने लगा दिया गया। 1992 से जिन संस्थाओं के तत्वावधान में राजा नारायण सिंह की पुण्यतिथि मनाई जाती रही उनके योगदान को सुनियोजित साजिश के तहत सिरे से नकार दिया गया। ये नाखून कटाकर शहीद होने की बानगी है। इससे थोड़ी राजनीतिक बढ़त तो जरूर मिलती है पर जनता के दिलों में जगह नहीं बनती। सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोगों को अपना दिल बड़ा रखना चाहिए। छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता। जब समकालीन दौर में ये हाल है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि लेखकों की पूर्वाग्रही मानसिकता के कारण कितने वास्तविक स्वतंत्रता सेनानी इतिहास के पन्नों से गायब हो गए होंगे तथा फर्जी सेनानी जगह पा गए होंगे। ये चंद पंक्तियां इस क्षुद्र राजनीति के नाम – जब वक्त गुलशन पे पड़ा तो हमने अपना खून दिया, आज बहार आई है तो कहते हैं तेरा काम नही। श्रेय तुम लूटो, बाकी 30 साल का अथक समर्पण तो हमारे हिस्से ही रहेगा। ये पब्लिक है सब जानती है। जिंदगी भर अंग्रेजों ने तथा मरणोपरांत अपने ही कर रहे अपमानित राजा नारायण सिंह को।

बंधुओं : राजा नारायण सिंह जगदीशपुर नरेश कुंवर सिंह से भी करीब एक शताब्दी पूर्व के महान स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं। इनके छापामार युद्ध कौशल ने अंग्रेजों का दांत खट्टे कर दिया था। उन्होंने अपने मित्र और बनारस राजा चेत सिंह के सहयोग मे करीब 3000 अंग्रेज सैनिकों को सोन नदी मे डुबो कर मार दिया था। इसी कारण जिदंगी भर अंग्रेजों ने राजा साहब के साथ छल, साजिश, अपमानित और प्रताड़ित करते रहे। इसके बावजूद जहां कुंवर सिंह दूनिया के ऐतिहासिक हिरो हैं, वहीं 1992 के पूर्व राजा साहब के इतिहास से औरंगाबाद भी अनभिज्ञ था। तब जन विकास परिषद एंव जनेश्वर विकास केन्द्र ने इनके इतिहास को उजागर करने और सम्मान दिलाने की बिड़ा उठाया। तत्कालीन जिला पदाधिकारी और पूर्व मुख्य सचिव दीपक कुमार को राजा साहब के इतिहास के बारे मे बताया गया तो वे काफी प्रभावित हुये और पहली बार 1992 मे नगर भवन मे उक्त संस्था द्वारा भब्य रूप से उनकी पुण्यतिथि मनाई गयी। तत्पश्चात परिषद बाजार के सामने डीएम द्वारा राजा साहब की प्रतिमा स्थल का शिलान्यास किया गया। विदित हो कि तबसे उक्त संस्था के सौजन्य से राजा साहब की पुण्यतिथि समारोह पूर्वक आयोजित कर गुमनामी के गर्त में धकेल दिए गए, उनके शौर्य पूर्ण इतिहास को लोकमानस में स्थापित करने हेतु अपने स्तर से भगीरथ प्रयत्न किए जाते रहे हैं। उनकी राष्ट्र प्रेम की भावना को हाइलाइट करने और और उनकी प्रतिमा स्थापना की ईमानदार कोशिश भी लगातार जरी रहा। राजा साहब के इतिहास से प्रभावित होकर समाजसेवी देव बेढ़नी निवासी मनोज कुमार सिंह ने भब्य प्रतिमा बनवाने की जिम्मेवारी ले ली। 1917 से प्रतिमा लगाने के निमित्त संकल्प को पूरा करने का सतत प्रयास किया जाता रहा। शुभ मुहूर्त देखकर कार्य शुरू किया गया तथा अभियंता द्वारा लेआउट कर प्लीन्थ का कार्य शुरू किया गया। अगले दिन प्लीन्थ का छड़ कटा हुआ , साइड पर रखा बालू,गिट्टी , सिमेंट की चोरी कर लिए जाने की जानकारी मिली। पता लगाया तो पता चला कि बड़ा प्लीन्थ और बड़ी प्रतिमा नहीं लगने देंगे। कारण जानना चाहा तो पीछे दूकान होने की बात कही गयी। तबसे संस्था, अवरोधों के बाद भी राजा साहब के कद के अनुसार, सम्मान देने हेतु भब्य प्रतिमा लगाना चाहता था और दूकान वाले साहब अपनी दूकान के सामने भब्य प्रतिमा नहीं लगने देने हेतु विभिन्न तरह छल और साजिश कर रहे और इसी साजिश के तहत छल और झूठे प्रचार कर राजा साहब के कद काठी के विपरीत पार्क के एक कोने मे अत्यंत छोटी प्रतिमा चोरी छुप्पे लगा दी। उनके इस छल और साजिश के जाने अथवा अनजाने हिस्सेदार बने हैं, नगर परषिद जनप्रतिनिधियों और नये अवतारी समाजसेवी वर्षों के भागीरथ प्रयत्न के द्वारा अनुकूल वातावरण तैयार कर, एक उपयुक्त जगह और भव्य मूर्ति निर्माण की जो मौलिक संकल्पना की गई थी। उसका गला घोट दिया गया। अंग्रेज तो बाहरी थे शासक थे। राजा साहब उनके शासन के विघ्नकारी थे अतः अंग्रेजों ने उनके साथ छल , साजिश और प्रताड़णा की। यह भी समझ मे आता है पर आज तथाकथित अपने ही कहे जाने वाले उनकी प्रतिष्ठा पर आघात कर, उन्हें अपमानित कर रहे हैं। ऐसे ही लोगों को लक्ष्य कर शायद मशहूर शायर, गालिब ने कहा था। रहने दे मुझे अंधेरे में ए ग़ालिब, क्योंकि उजाले में हमें अपनो के चेहरे नजर आते हैं। जैसा कि सब लोग जानते हैं समाचार पत्रों के द्वारा बार-बार यह खबर प्रसारित किया जा रहा था की आगामी 8 सितंबर को साक्षरता दिवस के उपलक्ष में उनकी भव्य आदम कद मूर्ति स्थापित की जाएगी परंतु संकीर्ण मानसिकता का परिचय देते हुए कुछेक लोगों द्वाराअत्यंत गोपनीय तरीके से एक दूसरी, अति सामान्य मूर्ति स्थापित करने की खानापूर्ति कर दी गयी,जो दुखद है। इतनी जल्दी बाजी में और चुपके से वगैर कोई विज्ञापित किए हुए, उस महान स्वतंत्रता सेनानी की मूर्ति स्थापना के नाम पर मात्र एक कर्मकांड पूरा किया गया। जान बूझककर उन्हें अपमानित करने वाले को बेपर्दा शीध्र ही किया जायेगा। समय बड़ा बलवान होता है। राजा साहब की आत्मा के साथ न्याय होगा और जरूर होगा। सत्य कभी पराजित नहीं होता, जनसामान्य के नैतिक संबल की अपेक्षा है।

 

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