राजनीति

महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बनी निवर्तमान ज़िला पार्षद सुमन 

मजबूत इरादे और दमदार वक्तव्य के लिए जानी जाती हैं सुमन

औरंगाबाद। एक समय था जब महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा जाता था तो वहीं समाज की मुख्यधारा से जुडऩे नहीं दिया जाता था और न ही कोई रोजगार करने दिया जाता था। उन्हें सिर्फ घर की चार दिवारी में कैद रखकर कभी मंगलसूत्र के बंधन में तो कहीं ममता के मोह में बांधकर मां बहन और पत्नी के रूप में वर्षो से पुरुषों के अधीन रखा गया। लेकिन आज परिस्थितियां बदल गयी है। महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चल रही हैं, और कई ऐतिहासिक सफलताएं भी पायी हैं। अपने परिवार का सहारा भी बन रही हैं। आमतौर पर देखा गया है कि राजनिति में अधिकाश महिलाओं के राजनितिक पितामह हुआ करते है। पितामह के रूप में चाहे वह परिवार, पड़ोसी या फिर अन्य हो। लेकीन आज एक ऐसी महिला के बारे में बता रहा हूं जो बिना किसी राजनितिक गुरु के बिना संघर्षों के बदौलत राजनिति में मिशाल कायम की है। वह मात्र 22 वर्ष की उम्र में पहली बार वर्ष 2016 में जिला पार्षद बनी। वह महिला मजबूत इरादे और दमदार वक्तव्य के लिए जानी जाती है। उनका उद्देश्य राजनीति नहीं बल्कि जनता का सेवा और सम्मान करना हैं। वह जनता का अच्छा-बुरा बेहतर समझती है। कई बार सार्वजनिक मंचों पर जनता की आवाज बुलंद करती नजर आई है। वहीं उनके अधिकारों के प्रति काफ़ी सचेत रहती है और जागरुकता के नये-नये रास्ते तलाश करती रहती है जिनका नाम सुमन कुमारी हैं। वह ज़िला परिषद क्षेत्र संख्या 24 से निवर्तमान ज़िला पार्षद हैं।

वायोग्राफी :

उनका जन्म 29 अप्रैल 1992 में औरंगाबाद ज़िले के कुटुम्बा प्रखंड के दघपा पंचायत के गोड़ियारपुर गांव में हुआ। वहीं, वह पली बढ़ी और 10 वीं की शिक्षा गर्ल हाई स्कूल हरिहरगंज से प्राप्त की और 12 वीं झारखंड के डालटेनगंज महिला कॉलेज से पूरी की है। वह अपने छात्र जीवन से ही राजनिति में रूची रखती थी। वह बताती हैं कि उनकी दादी लगातार पांच बार मुखिया रही हैं और दादा बालकेश्वर महतों स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका देश के कई महापुरुषों के साथ वैचारिक संबंध थे। पिताजी पहले ही गुजर चुके थे। परिवारिक जिम्मेदारी दादा के कंधों पर थी। लेकिन बदलते हालात और बुढ़ापे के कारण परिवारिक ज़िम्मेदारियां उठाने में वे असमर्थ हो चले थे। इसलीए उनकी इच्छा थी की सुमन सरकारी नौकरी करें। ताकि घर की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो सके। तत्पश्चात दादा की इच्छा और परिवार की जरूरतों को पूरी करने के लिए उन्होंने झारखंड पुलिस की तैयारी की। जो समय के साथ मेहनत और परिश्रम के उपरांत झारखंड पुलिस की लिखित और शारीरिक परीक्षा पास कर ली। लेकिन जिस सफलता के इंतज़ार में उन्होंने वर्षो कठिन परिश्रम क़िया। वह समय के साथ सपना साबित हुआ। बताती हैं। इस दौरान हमारे जीवन में कुछ अड़चने आई जो सरकारी नौकरी की चाह करते करते रह गए। तब तक उनकी शादी हो चुकी थी और संयोग से पति व आस पड़ोस की प्रेरणा से पहले ही प्रयास में ज़िला पार्षद बनी जिसे जनता ने युवा सोच व सहर्ष से भरें जूनून का भरपुर स्वागत किया। इसके बाद शुरू हुआ राजनीतिक जिम्मेदारियों का नया सफर। आखिरकार वह ज़िला पार्षद बनी। सुमन बताती है कि मैं खुद को ज़िला पार्षद नहीं बल्कि जनता की हितैषी मानती हूँ। जो हर परिस्थितियों में उनके साथ खड़ी रहती हूं। हालांकि ज़िला पार्षद बनने क बाद उन्हें अतिरिक्त प्रभार के रूप में लोक स्वस्थ परिवार कल्याण विभाग का जिला अध्यक्ष बनाया गया।

कार्य : 

अबतक वह अपने क्षेत्र में कई विकासात्मक कार्य किये जिसमें नली-गली, पीसीसी, ईट सोलिंग तथा समुदायिक भवन का निर्माण कार्य शामिल है। वह बताती है कि घर में अकेली होने के कारण मुझे परिवारिक के साथ-साथ राजनीतिक जिम्मेदारीयां भी पूरी करनी पड़ती हैं।

विचार : 

महिलाओं के बारे में बताती हैं कि बिगड़ते हालात के मद्देनजर बच्चीयों तथा महिलाओं की सुरक्षा सरकार व प्रशासन की पहली प्राथमिता होनी चाहिए। केन्द्र सरकार द्वरा आयोजित बेटी पढ़ाओं, बेटी बचाओं योजना को उसके मूल उदेश्यों से जोड़ने की आवश्यकता है। पढ़ाई से पहले बेटीयों की सुरक्षा आवश्यक है जिस पर सरकार कहीं ने कहीं फेल है। यदि उनकी सुरक्षा अधुरी है, तो भय के माहौल में वह क्या पढ़ेगी। यदि हम महिलाओं की स्थिति का आंकलन करें तो पता चलेगा कि वैदिक युग से लेकर वर्तमान समय तक महिलाओं की सामाजिक स्थिती में अनेक तरह के उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। उसी के अनुसार उनके अधिकारों में बदलाव भी होता रहा है। इन बदलावों का ही परिणाम हैं कि महिलाओं का योगदान राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्थाओं में दिनों-दिन बढ़ रही है जो कि समावेशी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक सफल प्रयास है। वह पेड़ पौधों से भी बेहद लगाव रखती है। सरकार की जल जिवन हरियाली के संदर्भ में कहती हैं कि यह सरकार की बेहतर योजनाओं में से एक है। बशर्ते इसके मूलभूत उद्देश्यों को धरातल पर उतारने की जरुरत है। इसके तहत अब तक वृक्षारोपण को काफ़ी बढ़ावा मिला है। साथ में पर्यावरण में भी काफ़ी सुधार हुआ है। इसे और वृहद पैमाने पर इनके मानकों को अनुपालन में लाने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री उज्वला योजना के संबंध में बताया कि इस योजना से ग्रामिणों को काफी लाभ मिला है। खास कर जो जंगली और सुदुर इलाकों से संबंध रखते है। इस योजना से मिलने वाली लाभ के अभाव में यहां के लोग जंगल की लकड़ीयों की भरपुर कटाई किया करते थे। इस योजना से फिलहाल जंगल से वृक्षों की कटाई पर कमी आई है। लेकीन बढ़ती महंगाई से यह योजना फेल होती नजर आ रही हैैं। हालांकि मंहगाई को कम कर इसे और बढ़ावा देने की आवश्यकता है। ताकि हमारा पर्यावरण स्वच्छ रहे और मौसम अनुकूलित हो सके।

उद्देश्य : भ्रष्टाचार मुक्त पारदर्शी प्रशासन तंत्रों का विकास करना।

बेरोजगारों को निशुल्क स्वास्थ्य सुविधा और रोजगार उपलब्ध कराना। प्रत्येक गांव में युवक मंगल दल का गठन। 

विद्यालयों में शिक्षण कार्य नियमित और गुणवत्ता पूर्ण हो। 

युवाओं को बेहतर उच्च शिक्षा दिलवाने की व्यवस्था। 

 प्रत्येक परिवार से एक युवा को रोजगार। युवा कल्याणकारी योजनाएं। 

 

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