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पहले अंग्रेजों ने और अब मरणोपरांत अपने ही राजा साहब को कर रहे हैं अपमानित

औरंगाबाद। राजा नारायण सिंह कुंवर सिंह से भी करीब एक शताब्दी पूर्व के महान स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं। अपने छापामार युद्ध कौशल ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिया था। उन्होंने अपने मित्र और बनारस राजा चेत सिंह के सहयोग मे करीब 3000 अंग्रेज सैनिकों को सोन नदी मे डुबो कर मार दिया था। इसी कारण जिदंगी भर अंग्रेजों ने राजा साहब के साथ छल और साजिश कर अपमानित और प्रताड़ित करते रहे। इसके बावजूद जहां कुंवर सिंह दूनिया के ऐतिहासिक नायक हैं, वहीं 1992 के पूर्व राजा साहब के इतिहास से औरंगाबाद भी अनभिज्ञ था। तब जन विकास परिषद एवं जनेश्वर विकास केन्द्र ने इनके इतिहास को उजागर करने और सम्मान दिलाने की बीड़ा उठाया। तत्कालीन जिला पदाधिकारी और पूर्व मुख्य सचिव दीपक कुमार को राजा साहब के इतिहास के बारे मे बताया गया तो वे काफ़ी प्रभावित हुये और पहली बार 1992 मे नगर भवन मे उक्त संस्था द्वारा भब्य रूप से उनकी पुण्यतिथि मनाई गयी। तत्पश्चात परिषद बाजार के सामने डीएम द्धारा राजा साहब की प्रतिमा स्थल का शिलान्यास किया गया। विदित हो कि तबसे उक्त संस्था के सौजन्य से राजा साहब की पुण्यतिथि समारोह आयोजित कर उनके इतिहास को हाइलाइट करते आ रहा है और उनके प्रतिमा स्थापना का ईमानदार प्रयास भी लगातार जरी था। राजा साहब के इतिहास से प्रभावित होकर समाजसेवी और बेढ़नी निवासी मनोज कुमार सिंह ने भब्य प्रतिमा बनवाने की जिम्मेवारी ले ली। 2017 ई. में प्रतिमा लगाने कार्य शुरू किया गया तथा अभियंता द्वारा लेआउट कर प्लीन्थ कार्य शुरू किया गया। अगले दिन प्लीन्थ का छड़ कटा हुआ, साइड पर रखा बालु गिट्टी, सिमेंट की चोरी कर लिए जाने की जानकारी मिली। पता लगाया तो पता चला कि बड़ा प्लीन्थ और बड़ी प्रतिमा नहीं लगने देंगे। कारण जानना चाहा तो पीछे दूकान होने की बात कही गयी। तबसे संस्था राजा साहब के कद के अनुसार सम्मान देने हेतु भब्य प्रतिमा लगाना चाहता था और दूकान वाले साहब अपनी दूकान के सामने भब्य प्रतिमा नहीं लगने देने हेतु विभिन्न तरह के छल और साजिश कर रहे थे। परन्तु पार्क की सौन्दर्यीकरण हो जाने के बाद अन्तर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस के शुभ अवसर पर राजा साहब की भब्य प्रतिमा लगाने की तिथि तय की गयी। तत्पश्चात अनावरण हेतु राज्यपाल और जनप्रतिनिधियों से सम्पर्क साधा जाने लगा। इसी बीच दूकान वाले साहब छल और साजिश के तहत राजा साहब के कद काठी के विपरीत पार्क के एक कोने मे रात्रि के अंधेरे मे अत्यंत छोटी प्रतिमा चोरी छुप्पे लगा दिया। उनके इस छल और साजिश के हिस्सेदार बने हैं नगर परषिद जनप्रतिनिधि और कुछ नये अवतारी समाजसेवी। राजा साहब जैसे व्यक्तित्व की प्रतिमा उनके ही पार्क के एक कोने मे और रात के अंधेरे मे चुपे चोरी लगाना राजा साहब को अपमानित करने जैसा है। अंग्रेज तो बाहरी थे। राजा साहब उनके शासन के विघ्नकारी थे। अतः अंग्रेज उनके साथ छल, साजिश और प्रताड़ित किया, समझ में आता है पर आज अपने ही उनके ये सब कर उन्हें अपमानित कर रहे हैं, यह समझ से बाहर है। समझने का प्रयास कर रहा हूं। जान बूझकर अपमानित करने वाले को बेपर्दा शीध्र ही किया जायेगा। विदित हो कि आज के समाचार पत्रो के माध्यम से उनके वंशजों को ढाल बनाकर लोगों को गुमराह करने का प्रयास किया गया है। इस संबंध मे कहना है कि राजा साहब का त्याग, समपर्ण और बलिदान का अंग्रेज भी कायल थे। इसीलिए राजा साहब पर अंग्रेजों ने जितना लिखा है उतना भारतीय इतिहासकार ने भी नहीं लिखा है। उनके इतिहास के लिखे जाने का जिक्र उनके वंशजों ने किया है। मै जानना चाहता हूँ कि उनके वंशज और तथाकथित अवतारी समाजसेवी राजा साहब को चर्चित करने हेतु एक भी कार्यक्रम किये जाने की बात प्रमाणित करें, यह मेरी चुनौती है। यदि उनके वंशज पहल करते तो आज राजा साहब भी कुंवर सिंह जैसे दुनिया के ऐतिहासिक पुरूष होते। अफसोस उनके द्वारा कुछ नहीं किया गया परंतु राजा साहब के करोडों की संपत्ति का वे उपयोग आज भी कर रहे हैं। पद आते जाते रहते है। पद का मोह न कल था और न आज है। परन्तु एक नागरिक होने का फर्ज अदा करते हुए राजा साहब को लोगों से रूबरू कराने के लिए 1992 से विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करते आ रहा हूं और जिला परिषद की जमीन को उनके प्रतिमा स्थल के लिए बचाये रखा। जहां कापीराइट की बात है तो इसका दावा कोई नहीं कर सकता। आप भी नहीं। जहां तक रुम बनाने कि बात कही गयी है तो यह निर्लज्जता कि हद पार करने जैसी बात है क्योंकि लेआउट और पाइलिंग का कार्य दिन के उजाले मे किये गये थे तथा उस समय आरोप लगाने वाले भी उपस्थित थे। सच्चाई यह थी कि हम लोग राजा साहब के कद काठी के अनूरूप भब्य प्रतिमा लगाना चाहते थे। सभी दुकानदारों का सहयोग भी मिल रहा था कारण वे सब राजा साहब को जिले का गौरव मानते थे। विरोध सिर्फ एक आदमी का जो उपर से तो राजा साहब का नजदीकी और गोतिया बताता है परन्तु अपनी दूकान के सामने राजा साहब की भब्य प्रतिमा नहीं लगे, इसके लिए सारी तिकड़म कर योजना बद्ध तरीके से राजा साहब के कद काठी के विपरीत प्रतिमा पार्क के एक कोने मे लगा दिया गया जिसकी जितनी निन्दा की जाये, वह कम होगा। इसके बावजूद राजा साहब को उचित मान सम्मान और स्थान के लिए संस्था निडर और निर्भय होकर हमेशा कार्य करती रहेगी।

 

 

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